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कर्ण पर्व
अध्याय ४०
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सञ्जय़ उवाच
सिद्धचारणसङ्घाश्च सम्पेतुर्वै समन्ततः |  ११५   क
चिन्तय़न्तो भवेदद्य लोकानां स्वस्त्यपीत्यह ||  ११५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति