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अनुशासन पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्य वाक्यस्य निधने पार्थ जातो ह्यहं मृगः |  २०   क
ततो मां शरणं प्राप्तं प्राह योगी महेश्वरः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति