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अनुशासन पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
अजरश्चामरश्चैव भविता दुःखवर्जितः |  २१   क
साम्यं समस्तु ते सौख्यं युवय़ोर्वर्धतां क्रतुः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति