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अनुशासन पर्व
अध्याय १८
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माण्डव्य उवाच
अचौरश्चौरशङ्काय़ां शूले भिन्नो ह्यहं यदा |  ३३   क
तत्रस्थेन स्तुतो देवः प्राह मां वै महेश्वरः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति