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अनुशासन पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
आदित्यचन्द्रावनिलानलौ च; द्यौर्भूमिरापो वसवोऽथ विश्वे |  ४७   क
धातार्यमा शुक्रवृहस्पती च; रुद्राः ससाध्या वरुणो वित्तगोपः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति