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अनुशासन पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
स्वाहा वषड्व्राह्मणाः सौरभेय़ा; धर्मं चक्रं कालचक्रं चरं च |  ४९   क
यशो दमो वुद्धिमती स्थितिश्च; शुभाशुभं मुनय़श्चैव सप्त ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति