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अनुशासन पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
विचिन्वन्तं मनसा तोष्टुवीमि; किञ्चित्तत्त्वं प्राणहेतोर्नतोऽस्मि |  ५५   क
ददातु देवः स वरानिहेष्टा; नभिष्टुतो नः प्रभुरव्ययः सदा ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति