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अनुशासन पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
वेदान्कृत्स्नान्व्राह्मणः प्राप्नुय़ाच्च; जय़ेद्राजा पृथिवीं चापि कृत्स्नाम् |  ५७   क
वैश्यो लाभं प्राप्नुय़ान्नैपुणं च; शूद्रो गतिं प्रेत्य तथा सुखं च ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति