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अनुशासन पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
स्तवराजमिमं कृत्वा रुद्राय़ दधिरे मनः |  ५८   क
सर्वदोषापहं पुण्यं पवित्रं च यशस्विनम् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति