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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
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व्राह्मण उवाच
शुभानामशुभानां च नेह नाशोऽस्ति कर्मणाम् |  १   क
प्राप्य प्राप्य तु पच्यन्ते क्षेत्रं क्षेत्रं तथा तथा ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति