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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
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व्राह्मण उवाच
यथा प्रसूय़मानस्तु फली दद्यात्फलं वहु |  २   क
तथा स्याद्विपुलं पुण्यं शुद्धेन मनसा कृतम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति