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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
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व्राह्मण उवाच
यच्च किञ्चित्सुखं तच्च सर्वं दुःखमिति स्मरन् |  ३१   क
संसारसागरं घोरं तरिष्यति सुदुस्तरम् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति