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शान्ति पर्व
अध्याय २७४
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भीष्म उवाच
ज्वरं च सर्वधर्मज्ञो वहुधा व्यसृजत्तदा |  ४९   क
शान्त्यर्थं सर्वभूतानां शृणु तच्चापि पुत्रक ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति