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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
किं तु मद्वचनाद्व्रूहि राजानं भरतर्षभम् |  ८   क
यद्यदिच्छसि यावच्च गृह्यतां मद्गृहादिति ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति