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सभा पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
वर्चस्विनां व्राह्मणानां स्नातकानां परिच्छदान् |  २२   क
आच्छाद्य सुहृदां वाक्यैर्मनोज्ञैरभिनन्दिताः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति