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सभा पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
गण्डकीय़ां तथा शोणं सदानीरां तथैव च |  २७   क
एकपर्वतके नद्यः क्रमेणैत्य व्रजन्ति ते ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति