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वन पर्व
अध्याय २५५
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो घोरतरः शव्दो रणे समभवत्तदा |  २   क
भीमार्जुनय़मान्दृष्ट्वा सैन्यानां सय़ुधिष्ठिरान् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति