वन पर्व  अध्याय १८

वासुदेव उवाच

स तं रथवरं श्रीमान्समारुह्य किल प्रभो |  १३   क
मुमोच वाणान्कौरव्य प्रद्युम्नाय़ महावलः ||  १३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति