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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
तमास्थितः सन्ददृशे किरीटी; स्रग्वी वराण्याभरणानि विभ्रत् |  १९   क
धनञ्जय़ो वज्रधरप्रभावः; श्रिय़ा ज्वलन्पर्वतमाजगाम ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति