वन पर्व  अध्याय ५२

वृहदश्व उवाच

ददर्श तत्र वैदर्भीं सखीगणसमावृताम् |  ११   क
देदीप्यमानां वपुषा श्रिय़ा च वरवर्णिनीम् ||  ११   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति