वन पर्व  अध्याय १८

वासुदेव उवाच

तत उत्थाय़ कौरव्य प्रतिलभ्य च चेतनाम् |  २०   क
मुमोच वाणं तरसा प्रद्युम्नाय़ महावलः ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति