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वन पर्व
अध्याय १८
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वासुदेव उवाच
विक्षिपन्नादय़ंश्चापि धनुःश्रेष्ठं महावलः |  ३   क
तूणखड्गधरः शूरो वद्धगोधाङ्गुलित्रवान् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति