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वन पर्व
अध्याय १८
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वासुदेव उवाच
स विद्युच्चलितं चापं विहरन्वै तलात्तलम् |  ४   क
मोहय़ामास दैतेय़ान्सर्वान्सौभनिवासिनः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति