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वन पर्व
अध्याय १८
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वासुदेव उवाच
नास्य विक्षिपतश्चापं सन्दधानस्य चासकृत् |  ५   क
अन्तरं ददृशे कश्चिन्निघ्नतः शात्रवान्रणे ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति