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वन पर्व
अध्याय १८
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वासुदेव उवाच
मुखस्य वर्णो न विकल्पतेऽस्य; चेलुश्च गात्राणि न चापि तस्य |  ६   क
सिंहोन्नतं चाप्यभिगर्जतोऽस्य; शुश्राव लोकोऽद्भुतरूपमग्र्यम् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति