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द्रोण पर्व
अध्याय ९४
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सञ्जय़ उवाच
तत्तस्य विस्मापय़नीय़मग्र्य; मपूजय़न्योधवराः समेताः |  १८   क
यद्वर्तमानानिषुगोचरेऽरी; न्ददाह वाणैर्हुतभुग्यथैव ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति