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वन पर्व
अध्याय ४३
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अर्जुन उवाच
नातप्ततपसा शक्य एष दिव्यो महारथः |  १७   क
द्रष्टुं वाप्यथ वा स्प्रष्टुमारोढुं कुत एव तु ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति