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विराट पर्व
अध्याय १८
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द्रौपद्यु उवाच
सहदेवस्य वृत्तानि चिन्तय़न्ती पुनः पुनः |  २५   क
न विन्दामि महावाहो सहदेवस्य दुष्कृतम् |  २५   ख
यस्मिन्नेवंविधं दुःखं प्राप्नुय़ात्सत्यविक्रमः ||  २५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति