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विराट पर्व
अध्याय १८
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द्रौपद्यु उवाच
ह्रीनिषेधो मधुरवाग्धार्मिकश्च प्रिय़श्च मे |  २९   क
स तेऽरण्येषु वोद्धव्यो याज्ञसेनि क्षपास्वपि ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति