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विराट पर्व
अध्याय १८
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द्रौपद्यु उवाच
तं दृष्ट्वा व्यापृतं गोषु वत्सचर्मक्षपाशय़म् |  ३०   क
सहदेवं युधां श्रेष्ठं किं नु जीवामि पाण्डव ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति