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भीष्म पर्व
अध्याय ९५
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सञ्जय़ उवाच
मातुलः शकुनिः शल्यः कृपो द्रोणो विविंशतिः |  १६   क
यत्ता रक्षन्तु गाङ्गेय़ं तस्मिन्गुप्ते ध्रुवो जय़ः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति