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शान्ति पर्व
अध्याय ५०
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वैशम्पाय़न उवाच
चातुर्वर्ण्येन यश्चैको धर्मो न स्म विरुध्यते |  ३३   क
सेव्यमानः स चैवाद्यो गाङ्गेय़ विदितस्तव ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति