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सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
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कृप उवाच
नाथवन्तं तु सुहृदः प्रतिषेधन्ति पातकात् |  ५   क
निवर्तते तु लक्ष्मीवान्नालक्ष्मीवान्निवर्तते ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति