द्रोण पर्व  अध्याय १८

सञ्जय़ उवाच

दृष्ट्वा तु संनिवृत्तांस्तान्संशप्तकगणान्पुनः |  १   क
वासुदेवं महात्मानमर्जुनः समभाषत ||  १   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति