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द्रोण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
आत्मनः प्रतिरूपैस्तैर्नानारूपैर्विमोहिताः |  १२   क
अन्योन्यमर्जुनं मत्वा स्वमात्मानं च जघ्निरे ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति