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द्रोण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
अथ प्रहस्य वीभत्सुर्ललित्थान्मालवानपि |  १६   क
माचेल्लकांस्त्रिगर्तांश्च यौधेय़ांश्चार्दय़च्छरैः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति