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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
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वासुदेव उवाच
होतारमपि हव्यं च विद्धि मां भृगुनन्दन |  ९   क
अध्वर्युः कल्पकश्चापि हविः परमसंस्कृतम् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति