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द्रोण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
भेरीमृदङ्गशङ्खांश्च दध्मुर्वीराः सहस्रशः |  २०   क
सिंहनादरवांश्चोग्रांश्चक्रिरे तत्र मारिष ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति