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द्रोण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
ततः प्रसिष्विदे कृष्णः खिन्नश्चार्जुनमव्रवीत् |  २१   क
क्वासि पार्थ न पश्ये त्वां कच्चिज्जीवसि शत्रुहन् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति