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द्रोण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
उह्यमानास्तु ते राजन्वह्वशोभन्त वाय़ुना |  २४   क
प्रडीनाः पक्षिणः काले वृक्षेभ्य इव मारिष ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति