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द्रोण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
पश्य मेऽस्त्रवलं घोरं वाह्वोरिष्वसनस्य च |  ३   क
अद्यैतान्पातय़िष्यामि क्रुद्धो रुद्रः पशूनिव ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति