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द्रोण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
विप्रविद्धासिनखराश्छिन्नवर्मर्ष्टिशक्तय़ः |  ३२   क
पत्तय़श्छिन्नवर्माणः कृपणं शेरते हताः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति