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द्रोण पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
एकवर्णेन सर्वेण ध्वजेन कवचेन च |  ४९   क
अश्वैश्च धनुषा चैव शुक्लैः शुक्लो न्यवर्तत ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति