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कर्ण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
सा कृत्वा स्यन्दनं भस्म हय़ांश्चैव ससारथीन् |  १४   क
पपात धरणीं तूर्णं दारय़न्तीव भारत ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति