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कर्ण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
सुतसोमस्तु शकुनिं विव्याध निशितैः शरैः |  १७   क
नाकम्पय़त संरव्धो वार्योघ इव पर्वतम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति