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कर्ण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
हताश्वो विरथश्चैव छिन्नधन्वा च मारिष |  २२   क
धन्वी धनुर्वरं गृह्य रथाद्भूमावतिष्ठत |  २२   ख
व्यसृजत्साय़कांश्चैव स्वर्णपुङ्खाञ्शिलाशितान् ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति