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कर्ण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
रथोपस्थान्समीक्ष्यापि विव्यथे नैव सौवलः |  २४   क
प्रमृद्नंश्च शरांस्तांस्ताञ्शरव्रातैर्महाय़शाः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति