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कर्ण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
स च्छित्त्वा सगुणं चापं रणे तस्य महात्मनः |  ३६   क
पपात धरणीं तूर्णं स्वर्णवज्रविभूषितः |  ३६   ख
सुतसोमस्ततोऽगच्छच्छ्रुतकीर्तेर्महारथम् ||  ३६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति