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कर्ण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
यादृशं दृश्यते रूपमन्तकप्रतिमं भृशम् |  ४७   क
गमिष्यत्यद्य पदवीं भारद्वाजस्य संय़ुगे ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति