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कर्ण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
विनिःश्वस्य ततः क्रुद्धः कृपः शारद्वतो नृप |  ५०   क
पार्षतं छादय़ामास निश्चेष्टं सर्वमर्मसु ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति